"जब तुम्हारा कोई साथ न दे तो, अकेले ही पथ पर चलते रहो, सहस्त्रों वर्षों से उत्पीड़ित शोषितों के जीवन में नया प्रकाश फैलाने के लिए अल्पायु में ही ज्योतिबा भी अकेले चले थे, केवल जीवन संगीनी का ही उन्हें सहबल प्राप्त था।"
गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर
His Thoughts

विचार

महात्मा ज्योतिबा फुले केवल समाज सुधार करना नहीं चाहते थे, वे एक वर्गहीन और शोषण मुक्त समाज का निर्माण करना चाहते थे, सामाजिक क्रांति करना चाहते थे। इसी से उन्हें ' सामाजिक क्रांति ' के अग्रदूत कहा जाता है। इस सामाजिक क्रांति के लिए तीन बातें करना आवश्यक था। एक- तत्कालीन शोषित , उपेक्षित जनता को अपनी गुलामी और शोषण की प्रतीती कराके उसके मन में क्रोध उत्पन्न करना, दो- उन शोषितों में आत्म सम्मान जगाना और तीन- विभिन्न जातियों में बंटे हुए शुद्रतिशुद्र वर्ग में मूलत: उनके एक होने का भाव उत्पन्न करना।

हजारों वर्षों से चली आई मानसिकता दासता के कारण फुलेजी का हर कार्य सर पटककर पहाड़ तोड़ने जैसा असंभव कोटि का था, लेकिन कभी भी हार न मानते हुए वे लगातार प्रहार करते रहे। इस प्रकार ज्योतिबा पहले व्यक्ति हैं जिन्होंने शुद्रातिशुद्रों में आत्म सम्मान जगया और शुद्रों को बताया कि उनकी सामाजिक दासता उनके पूर्वजन्मों का फल नहीं है, यह अशिक्षा और शताबिदयों से थोपी गई मानसिक दासता का फल है। अगर मध्यकालीन संतो, कबीर, रविवाद की वाणियाँ नहीं होती तो शुद्र और निम्न वर्गों का अधिकांश हिस्सा ईसाई धर्म कबूल कर लेता।

ज्योतिबा फुले 1887 में पूना जिले के धमतेरे गाँव में एक नाई परिवार के विवाह में सम्मलित हुए थे ज्योतिबा नाई समाज को बड़ा मान देते थे। ज्योतिबा का सत्यशोधक समाज सुधारवादी कार्यक्रमों के कारण सम्पूर्ण महाराष्ट्र में लोकप्रिय होकर शुद्र, अतिशुद्र, निम्न वर्ग, किसान, कामगार और दस्तकारों में जागृति की लहर फैलाने वाला, क्रांतिकारी परिवर्तन लाने वाला, जन आन्दोलन बन गया था।

ज्योतिबा सदैव व्यवहारिकता के धरातल पर चिंतन करते थे वह एक तपस्वी और कर्मवीर थे। वह त्याग, सेवा, सदाशयता से परिपूर्ण एक महान कर्मयोगी थे। वे संत कबीर की तरह "पाखंड ढोंग और बनावटी सिद्धान्तों" का अजन्म विरोध करते रहे। उन्होंने बार बार स्पष्ट कहा कि धर्म और जातिभेद, ऊँच-नीच का भ्रमजाल फैलाकर अन्याय और शोषण की प्रक्रिया चालू रखने के लिए बनाऐ गये हैं जिसे हमें ध्वस्त करना है।


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