"महात्मा ज्योतिबा फुले की सोच हमें मुश्किलों से लड़ने की शक्ति प्रदान करती है।"
छगन भुजबल
Jyatibaa Phule

महात्मा फुले जीवनी

जन्म : 11 अप्रेल, 1827 को पिता गोविन्द राव माता चिमना बाई की कोख से ज्योतिबा फुले का जन्म हुआ।
जन्म स्थान : पुणे (महाराष्ट्र)
जाति : माली (माली जाति को उत्तर भारत में सैनी नाम से जाना जाता है माली जाति की उप-शाखाओं में सैनी, रामी, मारवाड़ी, फूल, फुलेरिया, मरार, मालाकार, रेड्डी, शाक्य, मौर्य, काछी, कुशवाहा, हरदिया, सूर्यवंशी आदि आदि उपजातियाँ है जो मण्डल आयोग व कई राज्यों की सूची में पिछड़ी जाति में शामिल है)

माता से विछोह

ज्योतिराव फुले की एक वर्ष की आयु में ही माता चिमनाबाई का वर्ष 1828 में देहावसान हो गया था। (महापुरूषों का इतिहास भी यही रहा है बालक सिद्धार्थ गौतम की माता महामाया देवी उनके जन्म के कुछ दिन बाद ही स्वर्ग सिधार गई थी बालक कबीर को तो जन्म लेते ही बनारस में लहरतारा सरोवर के निकट कमल पत्र पर रखकर त्याग दिया था।)

लालन पालन

पिता गोविन्द राव को माली बिरादरी वालों ने बहुत समझाया कि बच्चे की जिम्मेदारी देखते हुए दूसरी शादी कर लो, किन्तु उन्होंने सबको स्पष्ट मना कर दिया, उनकी मौसेरी बहन सुगणा बाई क्षीरसागर की छत्र छाया में ज्योतिबा का लालन पालन हुआ।

शिक्षा

पिता गोविन्दराव अनपढ़ थे वे धार्मिक प्रवृत्ति के होने के कारण अपनी निम्न जाति का होने के बाद भी उन्होंने अपने को कभी छोटा नहीं समझा, उनमें जातीय अभिमान था, कर्म और श्रम के प्रति गहरी निष्ठा थी। पूना शहर के मराठी पंडितगण अपने घर में ही केवल ब्राह्मण महाजन, धनिक कर्म, सामंत जमीदार और उच्च वर्ग के बच्चों को संस्कृत, व्याकरण तर्कशास्त्र, न्याय दर्शन की शिक्षा दिलाते थे। दलित व निम्न जातियों के बच्चे शिक्षा से वंचित रह जाते थे।

ब्रिटिश राज्य में विदेशी ईसाई धर्म प्रचारकों ने पूना में कई अंग्रेजी पाठशालाऐं खोली थी। ज्योतिबा फुले की आयु सात वर्ष की होने पर पिता ने बालक ज्योतिबा को मराठी पढ़ने लिखन का सामान्य ज्ञान व हिसाब किताब करने लायक कर पन्तोजी के स्कूल में प्राथमिक शिक्षा दिलाई उन्हें मिशनरी स्कूल में भर्ती कराया, किन्तु कट्टरपंथी हिन्दु, निम्न व शुद्र जाति के विद्यार्थियों को स्कूल से निकलवाने पर तुले हुए थे, उनके नेता धकदी दादाजी प्रभु के इशारे पर निम्न व शुद्र बच्चों के नाम काट दिये जिससे ज्योतिब की पढ़ाई बीच में ही रुक गई और अपने खेत पर माली जाति का कार्य साग भाजी, फल और फूल की खेती करने लगे, उनका विवाह 14 वर्ष की आयु में 8 वर्ष की सावित्री बाई से हो गया।

7 मार्च, 1835 को गर्वनर जनरल लार्ड विलियम बैंटिक ने आदेश जारी किया कि ''ब्रिटिश सरकार द्वारा लागू की जा रही शिक्षा-नीति का उद्देश्य भारतवासियों को यूरोपीय साहित्य और विज्ञान से परिचित कराना है।

ज्योतिबा दिन में खेत में काम करते और रात्रि में घर में ही पढ़ते थे, उनके पड़ोसी उर्दू-फारसी के गफ्फार बेग शिक्षक एवं इसाई पादरी लेजिट ने 1841 में पुन: स्कूल में भर्ती करा लिया, ज्योतिबा ने अंग्रेजी भाषा की भी शिक्षा ली व वार्षिक परीक्षा में सर्वोच्च अंक प्राप्त कर सबको अचंभे में डाल दिया, उनके मन में हिन्दू धर्म की विसंगतिया, उँच-नीच, जाति पाति समाज में फैले अंध-विश्वास और कुरीतियों को मानव विकास में बाधक मानता, अमीर गरीब की मानवकृत दीवारों, धर्म का उद्देश्य आत्मिक विकास ही मानवता की सेवा करना जैसे विचारों ने उथल पुथल मचा दी वे वर्ण व्यवस्था की खोखली सामाजिक दिवारों, धार्मिक पाखण्ड और जातिवाद को मिटाना चाहते थे, उनके उत्कृष्ट देश प्रेम था। घर की आर्थिक हालात ठीक नहीं होने से उँची शिक्षा प्राप्त नहीं कर सकें। 20 वर्ष की आयु 1874 में ज्योतिबा ने उस समय की सातवी कक्षा (ग्रेजुएट) अंग्रेजी पाठशाला में पूर्ण कर सहपाठियों में अग्रज बन गये थे।

धार्मिक ग्रंथ का प्रभाव

ज्योतिबा ने देखा कि ईसाई धर्म ग्रंथ, इस्लाम धर्म की कुरान पढ़ने पर कहीं कोई रोक नहीं, फिर आर्य ब्राह्मणों द्वारा रचित, वेदों तथा मनुस्मृतियों को क्यों छिपाकर रखते हैं, इसका भेद जानने के लिए ज्योतिबा ने गौतम बुद्ध, तीर्थकर रामानुज, रामानंद बसवेश्वर, गुरु नानक, कबीर, दादु का साहित्य पढ़ा, साथ ही संत तुकाराम की गाथा, ज्ञानेश्वरी भागवत धर्म कथा तथा प्रो. विल्सन जोन्स आदि की हिन्दु धर्म पर लिखी अंग्रेजी कृतियाँ गीता उपनिषद, पुराण, शिवाजी महाराज व जार्ज वाशिगंटन की जीवनी पढ़ी, इनकी ज्ञान समझ कर उनका चिन्तन ऊँचाई पर पहुँचने लगा। उन्होंने समझ लिया कि शिक्षा के बिना मानव की उन्नति के द्वार बन्द रहते है।

शस्त्र विधा

ज्योतिबा ने छत्रपति श्री शिवाजी की वीरता के किस्से कूट कूट कर भरे थे, उन्होंने युवावस्था में मांग जाति के उस्ताद लहुजी साल्वे से भाला, बरछी तीर कमान, आदि शस्त्रों की विधा सीखी।

लहुजी के शिष्य ज्योतिबा ने सामाजिक क्रांति के कार्य को अपनाया, वासुदेव फड़के ने अंग्रेजों के विरूद्ध शस्त्र उठाया, लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने सशस्त्र क्रांति को असंभव मानकर अंग्रेजों के खिलाफ लेखनी और वाणी से जनता में असंतोष उत्पन्न किया। (वास्तव में लहुजी साल्वे अंग्रेजी सत्ता के खिलाफ सीना तानकर खड़े रहने वाले सशस्त्र क्रांति के पहले गुरु हैं।)

जीवन की महत्वपूर्ण घटना

ज्योतिबा अपने परम मित्र सखाराम हरि परांजपे की बारात मे निमंत्रित थे वे बारात में शामिल होकर मित्र के साथ साथ चल रहे थे एक ब्राह्मण की बारात में ज्योतिबा का सम्मानपूर्वक शामिल होना कुछ कर्मठ सनातनियों को अच्छा नहीं लगा उन्होंने अपनी नाराजगी प्रकट कर ज्योतिबा को कुछ भला बुरा कह दिया कि एक शुद्र ने ब्राह्मणों की बारात में आने की हिम्मत कैसे की? उसे पंडित पुरोहितों के शरीर से स्पर्श का दण्ड दिया जायेगा, माली का बेटा और कहाँ यह पंडितों की वर यात्रा? अपने घर में फूल माला क्यों नहीं पिरोता? उनका धर्म भ्रष्ट करने यहाँ क्या आ गया इस प्रकार सार्वजनिक रूप से अपमानित होने का प्रसंग असहनीय एवं स्वाभाविक था, इस घटना से उनकी समझ में आया कि ब्राह्मण और गैर ब्राह्मण जातियों में इतना भेद क्यों है, बहुजन समाज अज्ञान की घोर गर्त में फँसा हुआ है, उन्हें कोई अधिकार नहीं उनकी पुकार सुनने वाला धनी धोरी कोई नहीं दिन रात जानवारों की तरह काम करे, खेती करने वाला खून पसीना एक करें और फसल पर अधिकार किसी और का, भर पेट भोजन नहीं, पहनने को वस्त्र की कमी, रहने को साधारण घर भी नहीं, सड़को के किनारे खुले गगन के नीचे, वृक्षों के तले जीने मरने के लिए ही मानो धरती पर जन्म लिया हो, ब्राह्मणवादी व्यवस्था से ज्योतिबा का अंत:करण मानो सिहर उठा, उनको हिन्दु समाज के उच्च वर्गों की तुलना में ईसाई धर्म की अच्छाइयां, मनुष्यता, सेवाभाव समानता, नि:स्वार्थ छूआछूत का नामोनिशान नहीं, पर सोचने लगे, कितना अच्छा होता हमारे हिन्दू र्धम में भी यही भाव होते, संभवत: इसी प्रसंग से उन्हें प्रेरणा मिली और ब्राह्मणों की अपेक्षा दलित, पीड़ित, ब्राम्हणेतर जनता को शिक्षा प्राप्ति के अवसर यदि शासन नहीं कर सके तो वे स्वयं उसे करेंगे। उनकी नस-नस में बगावत की लहर दौड़ रही थी वे सड़ी गली प्रथाओं तथा निषिद्ध परम्पराओं को शिक्षा द्वारा जागृति लाकर तोड़ने पर तुले हुए थे। उन्होंने शिक्षा का प्रचार और संगठित होकर करने की भावना बलवती हो गई तथा समाज में आमूल परिवर्तन करने की ठान ली, अपमान की यह घटना वरदान सिद्ध हुई वह एक महान समाज सुधारक व क्रांतिकारी बनें।

ज्योतिबा अछूतों के उद्धारक

पूना शहर में जब कोई अछूत गुजरता तो उसे अपनी पीठ के पीछे पत्तियों की एक झाडू बांधनी पड़ती थी जब चलता था तो स्वत: झाडू लग जाती थी, उसे गले में एक बर्तन भी बाँधना पड़ता था वह सड़क पर थूकने के बजाय उस बर्तन में थूंके। जब वह चले तो आवाज देकर लोगों को संभलने का मौका देवे। ब्राह्मणों के मत में इससे प्रदुषण नहीं हो सकें।

ऊँची जाति के होज व कुंए से जल लाने का अधिकार अछूत जातियों को नहीं था इस कारण गंदा पानी पीने से अनेक रोगों के शिकार हो जाते थे। ज्योतिबा इस अमानवीय व्यवहार के मूक दर्शक कैसे हो सकते थे, उन्होंने अपने घर का होज 1849 में अस्पृश्यों के लिये खुला कर दिया। नगर पालिका के सदस्य होने के नाते उन्होंने सार्वजनिक स्थानों पर हौज बनवानें की व्यवस्था की। अस्पृश्यता मिटाने अछूतों को गले लगाने उनके लिये शिक्षा के द्वार प्रारम्भ करने स्त्रियों को शिक्षित करने के कार्यों के कारण कुटुमिबयों तथा उच्च जाति के लोगों ने उनके पिता के सामने रोष प्रकट कर ज्योतिराव व सावित्रीबाई को घर से बाहर निकलवा दिया वे महारो को शिक्षित करने उनके यहाँ रहने लगे समाज द्वारा बहिष्कृत होने का उन्हें रंज मात्र दु:ख नहीं था।

महात्मा गांधी को ज्योतिबा के हरिजन उद्दार का सक्रिय पुरस्कार बीसवीं सदी में मिला तथा हरिजन की बस्ती में रहने का साहस दिखाया। माली समाज के ज्योतिबा - सावित्री बाई फुले ही ऐसे महा मानव थे जिन्होंने नीची जाति के लोगों को समानता का अधिकार दिलान का क्रांतिकारी संघर्ष आजीवन जारी रखा।

सावित्री बाई फुले प्रथम महिला शिक्षक

महात्मा फुले ने 20 वर्ष की आयु में अहमदनगर में उनके जज मित्र गोविंदे से भेंट की उनके साथ अमरीकन ईसाई पादरी महिला कुमारी फर्राट के मिशनरी स्कूल को देख प्रभावित हुए और पूना में ऐसा प्रयोग का संकल्प लेकर, बुधवार पेठ के भिंडे के मकान में प्रथम दलित महिला शिक्षा का उत्तरदायित्व 1848 में सौंपा, पुरानवादियों ने इस कदम की आलोचना की। हो-हल्ला मचा कि एक हिन्दू नारी शिक्षक बनकर समाज व धर्म से विद्रोह कैसे कर सकती है नारी को पढ़ना और पढ़ाना धर्म व शास्त्रों के विरूद्ध है। सावित्री बाई जब विद्यालय जाती तो वे लोग उन पर मिट्टी, धूल, गोबर, पत्थर फेंक कर ताने कसते किन्तु वे अपने उद्देश्य से विचलित नहीं हुई और ना ही घबराई, दलित शिक्षा के कार्यों से फुले के पिता गोविंद राव उच्च जाति के दबाव और बहकावे में आकर उन्होंने दोनों को घर से निकाल दिया।

आर्थिक कठिनाई और उलाहनों के कारण 1849 में स्कूल बन्द करना पड़ा किन्तु मित्र गोविंदे की प्रेरणा से जूना गंज पेठ में पुन: स्कूल खोल दिया जिसने दलित, पिछड़ों में हलचल मचाई पड़ोसी मुंशी गफ्फार बेग की बेटी फातिमा तथा एक ब्राह्मण युवक विष्णु पंत थट्टे ने पढ़ाना चालू किया किंतु भट्टै कट्टरपंथियों के उलाहने से स्कूल छोड़ गये।

मराठी शिक्षक केशव शिवराम भवालकर ने सावित्री बाई को शिक्षित प्रशिक्षित किया। 1850 में उनके विद्यालय में दलितों के बच्चों की संख्या बढ़ने लगी। 3 जुलाई 1851 को अन्ना साहब चिपलूकर के बुधवार पेठ में एक और विद्यालय खोला व सावित्री बाई मुख्य अध्यापक बनी। 17 सितम्बर को रास्ता पेठ में एक और विद्यालय चालू किया।

17 फरवरी, 1852 को स्कूल का निरीक्षण हुआ, जिसमें उन्हें प्रशंसा मिली और विभिन्न स्थानों पर दलित पिछड़ी महिलाओं के 18 विद्यालय प्रारम्भ हो गये। 16 नवम्बर को विश्राम बाड़ा में सार्वजनिक अभिनंदन एवं सरकार की ओर से मेजर कैंडी द्वारा फुले विद्यालय की प्रशंसा की तथा शाल व प्रशस्ति पत्र से सम्मानित किया। 1853 में मराठी ज्ञान प्रकाश व पूना आबजर्वर आदि समाचार पत्रों में सम्पादकीय छपे। कट्टरपंथियों में निराशा फैली। हमारे देश के इतिहास में सावित्री फुले प्रथम दलित शिक्षिका बनी।

सती प्रथा एवं विधवा विवाह

बंगाल में राजा राम मोहन राय ने सती प्रथा को बन्द कराने का कार्य किया व 27 सितम्बर, 1833 को उनकी मृत्यु हो गई। महात्मा फुले ने पूना में सती प्रथा का विरोध किया और विधवाओं के विवाह कराने के अभियान में 500 उत्साही कार्यकर्त्ताओं की अक्टूबर 1853 में भवानी विश्वनाथ की अध्यक्षता में हुई सभा में विधवा विवाह का प्रस्ताव कट्टर पंथियों के भय होने से सर्वसम्मति से पास नहीं हो पाया। 1854 में एक विधवा युवति का विचित्र व्यवस्था के अन्तर्गत खोखले पेड़ के तने में बैठकर अग्नि परीक्षा देने का प्रस्ताव शंकराचार्य द्वारा रखा जिसे फुले ने अजीबो गरीब व अव्यवहारिक एवं गुमराह करने वाला कदम बताया। 1860-61 में महादेव गोविन्द रानाड़े ने 'विधवा पुनर्विवाह संघ' की स्थापना कर पंढरपुर में विधवा आश्रम खोला।

पूना और आस पास के अधिकांश ब्राह्मण विधवा बहनों पर कट्टर परिवारजन की कड़ी देखरेख व अमानुषिक व्यवहार करते थे ये बहनें फुले के विधवा आश्रम की ओर आकृष्ठ हुई। उन्होंने 1863 में पतित व पथभ्रष्ट हुई अभागिन के बाल हत्या को रोकने के लिये एक आश्रम 'बाल हत्या प्रतिबंधक गृह' खोला एक ब्राह्मणी विधवा काशीबाई गर्भवती की प्रसूति अपने घर कराई। उसके बेटे यशवंत को गोद लिया। आर्य समाज ने भी ज्योतिबा फुले की बाल हत्या रोकने व विधवा विवाह, सतीप्रथा रोकने के आदर्शो से प्रेरणा ली। 1866 में विष्णु शास्त्री पंडित के सक्रिय सहयोग से फुले ने बम्बई प्रेसिडेंसी में विधवा विवाह समितियाँ गठित की उनकी देखादेखी 1867 में उच्च जाति के युवकों ने पूना एसोसियेशन बनाया जो चल नहीं सका।

1871 में सावित्री बाई को संयोजक बनाकर पूना में विधवा आश्रम खोला। ब्रिटिश सरकार ने 1872 में नेटिव मेरिज एक्ट लागू किया। 25 दिसम्बर, 1873 में ज्योतिबा एक सम्बन्धी की पत्नि का देहान्त होने पर उसका एक विधवा से विवाह कराया उनके अनुयायी विष्णु शास्त्री पंडित ने विधवा ब्राह्मणी से शादी की एवं इंद्र प्रकाश पत्रिका में विधवा विवाह के, फुले के समाज सुधार पर, सम्पादकीय लेख लिखे। विधवा विवाह के अभियान के परिणाम स्वरूप नारी उत्थान का फुले का अभियान सफल होने से 'सती-प्रथा' रुकी।

ज्योतिबा फुले नगर पालिका मेम्बर

ईस्ट इण्डिया कम्पनी से ब्रिटिश सरकार ने 1858 में इण्डिका एक्ट के आधीन भारत पर सत्ता सिंहासन हासिल कर लिया और 1 जनवरी, 1877 को महारानी विक्टोरिया भारत की साम्राज्ञी घोषित हुई। ब्रिटिश सरकार ने 1876 में भारत में स्वायत शासन नीति अपनाई जिसमें ज्योतिबा फुले को पूना नगर पालिका का सदस्य बनाया। 1882 के कानून से चुनाव की व्यवस्था लागू की।

माली जाती के ज्योतिबा फुले को सदस्य बनने के बाद उन्होंने सर्वप्रथम पिछड़ी व निम्न जाति के मोहल्लों में पानी, बिजली और सफाई की आवाज उठायी धनी मानी मेम्बरों ने ज्योतिबा के प्रस्तावों का खुलकर सर्मथन किया किन्तु धन की कमी बताई, ज्योतिबा ने धन की बात को बेमानी बताया उनके लोकहित के प्रयास सफल होने से प्रतिष्ठा बढ़ी। 1878 में बजट प्रस्तावा आया कि 50 रूपये मासिक में एक लिपिक की भरती की जाये, ज्योतिबा ने सुझाया कि एक 30 रू. में व एक 20 रू. में भरती की जाय जिससे दो लोगों को रोजगार मिले यह प्रस्ताव मान्य हो गया। उनके पास ब्राह्मण, मुसलमान, ईसाई ओर दलित जाति के लोग आते थे। वे हिसाब किताब व जाँच उप समिति के सदस्य बने।

नगर से कूड़ा करकट को बाहर उपयुक्त स्थान पर रखने की सिफारिश की। फुले के सुझावों में आमसभा की अनुमति के बिना पैसा खर्च नहीं किया जाये, प्रबन्ध समिति बनाने, आतंरिक गुटबाजी और स्वार्थ सिद्धि के विरूद्ध होकर लोकहित को प्राथमिकता देते थे। सब्जी बाजार की दुकान का किराया चार आना से अधिक न हो।

सब जानते थे कि ज्योतिबा सच्चे देशभक्त और समाज सुधारक है, फिजूल खर्ची के विरोधी थे। जब लार्ड लिटन पूना आये तो कुल 36 सदस्यों में से ज्योतिबा ने ही स्वागतद्वारों की फिजुलखर्ची के प्रस्ताव का विरोध किया, शराब की दुकान बढ़ाने के प्रस्ताव का विराध किया। पशु चिकित्सा कॉलेज/प्राईमरी पाठशाला में छात्रवृति बढ़ाने/एक अंग्रेज गवर्नर के नाम से सब्जी मण्डी बनी, यही बाद में 'फुले मार्केट' के नाम पर आज तक है। नगर पालिका की सदस्यता 1882 के बाद में दिलचस्पी नहीं दिखाई, वे एक मात्र ऐसे मेम्बर थे जो लोकहित के कार्यों के नाम पर जाने जाते थे।

मजदूर-किसान आन्दोलन के प्रणेता

जब ऊँची जाति वालों ने पिता को बहकाकर फुले को विद्याअध्ययन से निकलवाया था तब वे खेतों में पिता के साथ काम में हाथ बटाते थे वे जानते थे कि किसान मजदूर कड़ी मेहनत करे तब रोटी मिलती है, अशिक्षा, धार्मिक रूढ़ियाँ और कट्टरता, अस्पृश्यता ऊँच-नीच का बोझ समाज में अपमान, मजदूरों की दुर्दशा, सांमतों, जमीदारों ऊँची जाति के दुकानदारों कारखाना मालिकों के यहाँ ऐडी चोटी का जोर लगाने पर दो जून की रोटी मिलती है फिर भी अछूत के अछूत, गुलाम आदमी नहीं जैसे पशु हो की व्यवस्था से गुजरे थे। वे जानते थे कि अंग्रेज एक शासक जाति है, सामंत, जमीदारों के जरिये जमीन जोतने वाले किसानों को वश में रख बिचौलियों का कार्य करते है, अंग्रेजों के हाथ दास्तकारों, शिल्पकारों को तबाह होते देखा था। नवपूंजीवाद के फलते फुलते देशी पूंजीपतियों ने जब पैर पसारना शुरू किया तो मजदूरों का खूब शोषण किया। मुस्लिम शासक या अंग्रेज शासक रहे हो अधिकांश जनता खेती के सहारे जीविकोपार्जन करती है वे सामाजिक एवं राजनैतिक परिवर्तनों पर ध्यान नहीं देते थे। ग्रामीण शिल्पकार किसानों से अधिक संपन्न होते थे।

फुले ने गरीब मराठो को संगठित किया तथा उनका नेतृत्व किया। इधर भारत में मजदूर आन्दोलन के जनक ज्योतिबा फुले थे, उधर योरोप में कार्ल मार्क्स ने विश्व इतिहास में 1848 में कम्युनिस्ट मेनीफेस्टो प्रकाशित किया, इसी समय अमेरिका में बेलसियन चर्च में नारी आन्दोलन शुरू हुआ मार्क्स ने लिखा था- औधोगिक क्रांति के फलस्वरूप छोटे छोटे ग्रामीण धन्धे खत्म होते चले जायेंगे, खेतीहर मजदूर बढ़ते जायेंगे गाँव और कस्बो से आबादी बड़े औधोगिक नगरों की ओर पलायन करेगी नया सर्वहारा वर्ग अस्तित्व में आयेगा जो क्रांति के लिये प्रभावशाली भूमिका अदा करेगा, यही सब 1854 से 1884 के बीच हुआ।

ज्योतिबा फुले ने दिसम्बर, 1874 में महाराष्ट्र के किसानों के विद्रोह को सक्रिय सहयोग व नैतिक समर्थन दिया। ज्योतिबा फुले ने पूना नगर पालिका के सदस्य बने तब वे बम्बई के मिल मजदूरों की समस्याओं पर दिलचस्पी लेने लगे। मिलों में मजदूरों बच्चों, महिलाओं से 14 घंटे काम लेते थे। उनके 'सत्य शोधक समाज' और नारायण मेघजी लोखंडे द्वारा स्थापित 'मिल कर्मचारी संघ' ने काम के घंटे के खिलाफ आवाज उठाई 1884 में दीनबन्धु सामाजिक सभा में मजदूरों की आवाज ज्योतिबा ने उठाई जिलाधीश डब्लू बी. मुलोच की अध्यक्षता में एक आयोग बना जिसने बाल मजदूरों की आयु सात से नौ वर्ष अधिकतम बारह से चौदह वर्ष उनके काम के घंटे प्रात: सात से शाम पांच बजे व एक घंटे का बीच में अवकाश, सफाई व्यवस्था का प्रबन्ध की मांग पूरी कर दी, उन्होंने मजदूरों में सामाजिक चेतना और आर्थिक आधारों की लड़ाई लड़ने का बीज मंत्र बम्बई की धरती पर बोया था। जो भविष्य में भारत ही नहीं पूरे एशिया के सर्वहारा आन्दोलन को दिशा देने वाला सिद्ध हुआ। फुले की परम्परा को अहमदाबाद में गुलजारीलाल नंदा, बम्बई में कामरेड, जोशी तथा डांगे ने आगे बढ़ाया।

इस प्रकार यूरोप में कार्ल मार्क्स और एशिया में ज्योतिबा फुले 'किसान मजदूर आन्दोलन' के आदि प्रणेता, जन्मदाता, मार्गदर्शक है। उन्होंने पूना में 1857 में नाइयों की हड़ताल को समर्थन दिया जिससे हजामत बनाने की दर बढ़ सकी थी। किसानों को कर्ज से मुक्ति दिलाने हेतु साहुकारों के विरूद्ध मोर्चा खोला।
ज्योतिबा की मार्मिक बात -

"शिक्षा के अभाव में बुद्धि का विनाश हो जाता है,
बुद्धि के अभाव में नैतिकता का पतन हो जाता है,
नैतिकता के अभाव में प्रगति रुक जाती है,
प्रगति के और धनाभाव के कारण शुद्र नष्ट हो जाता है,
और सभी दु:खों का कारण अविद्या है।"

महात्मा ज्योतिबा फुले और कांग्रेस

1857 में प्रथम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम जो मेरठ से प्रारम्भ होकर दिल्ली, उत्तर भारत, मध्य भारत, बिहार, महाराष्ट्र, गुजरात तक जब फैला महात्मा ज्योतिबा फुले तब 30 वर्ष के युवा थे। उनके विचारों से यह जनवादी सशस्त्र क्रांति थी उत्तर भारत में जिस गति से विद्रोह फैला दक्षिण में उतना असर नहीं था। आम जनता अशिक्षा, हिन्दू धर्म में व्याप्त कुरीतियों अस्पृश्यता, ऊँच-नीच की भावना, सेना में शुद्रों को भरती नहीं करने से सम्पूर्ण जन आन्दोलन नहीं बना सका था।

फुले ने पूना में एक विशाल जुलुस सत्य शोधक समाज के बेनर पर अप्रेल, 1857 में ब्राह्मणों की पुण्य नगरी में बैलगाड़ी ढ़ोल ढ़माकों से शहर निकाल कर सबको अचमिभत करते सभा को ज्योतिबा फुले, रमैय्या व्यंकैय्या ऐय्याचारू, महादेव गोविन्द रानाडे आदि ने सम्बोधित किया, इसी वर्ष बम्बई में भी सभाएं हुई, देश के अन्य भागों में भी स्वतंत्रता संग्राम फैल गया।

ज्योतिबा फुले जब 58 वर्ष के हुए 1885 में कांग्रेस की स्थापना हुई, उनके विचार थे कि "ब्रिटिश शासन भारत में स्थायी रूप से नहीं रह सकता"। उन दिनों कांग्रेस में ब्राह्मणों का अधिपत्य था वे कहते थे कि ब्राह्मण जब अंग्रेज अधिकारियों के साथ बैठकर अण्डे शराब, गोश्त खाते है तथा मुस्लिम रखैल औरतों से सम्बन्ध रखते है तो उनको माँगो-म्हारों के साथ स्नेह पूर्वक भोजन करने में क्या आपत्ति से सम्बन्ध रखते है तो उनको माँगो-म्हारों के साथ स्नेह पूर्वक भोजन करने में क्या आपत्ति है. उन्होंने यह कहा कि कांग्रेस शोषित-पीडित भारतीय जनता की निडर आवाज उठाने वाली लोक सेवक संस्था बनाना चाहिये, कालान्तर में यही हुआ और कांग्रेस एक जन आन्दोलन बन गया, उनका सदा यही कहना था कांग्रेस जितने संघर्षो और कठिनाइयों से गुजरेगी उसका स्वरूप क्रांतिकारी होता जाएगा और वह सोये भारत को एकता के सूत्र में पिरोकर आगे बढ़ेगी। इन्हीं आदर्शों को महात्मा गांधी ने अपनाकर भारत को आजादी दिलाने में अग्रणी रहे व कांग्रेस के ही स्वतंत्रता संग्राम सेनानी तथा जन नायकों की अगुवाई में भारत को आजादी मिली सत्ता प्राप्त हुई।

महात्मा की उपाधि

11 मई, 1888 को बम्बई के मांडवी कोलीवाडा में ज्योतिबा का भव्य अभिनन्दन किया, जिसमें विभिन्न वक्ताओं ने ज्योतिबा के असाधारण धैर्य, त्याग, ध्येय, निष्ठा, समानता समभाव आदि गुणों का वर्णन किया तो कुछ ने कहा "निरन्तर 40 वर्षो तक निस्वार्थ भाव से जनसेवा करने वाले ज्योतिबा महाराष्ट्र के आदि पुरूष है" फिर ठसा ठस भरे सभा स्थल पर राय बहादुर श्री विटठलराव वंडेकर ने कहा "ज्योतिबा की उग्र तपस्या के कारण महाराष्ट्र के स्त्री पुरूषों का मानव अधिकारों, जागृति और चेतना की स्थायी धरोहर मिल गई है, इसलिये ज्योतिबा सच्चे महात्मा है, हम सभी उपसिथत जन ज्योतिबा को स्वस्फूर्ति से महात्मा की उपाधि प्रदान करते है" इस पर देर तक तालियाँ बजती रही। ज्योतिबा ने कहा "यह अल्प-सा कार्य मैनें ईश्वर की प्रेरणा से किया है मैं आज तक यही मानता रहा हूँ कि जनसेवा ही सच्ची ईश्वर सेवा है और आगे भी यही करता रहूंगा। आप सभी लोग सत्यशोधक समाज के कार्य में सहायता देकर आगे बढ़ा रहे है जिन्हें हजारो वर्षो से शुद्रादिशुद्र समझा जाता रहा है उन्हें मानव अधिकार दिलाने को ही मैं धर्म मानता हूँ, यही हर एक का कर्तव्य है। मैनें कोई विशेष कार्य नहीं किया है, लेकिन जो कार्य मैंने किया है, वह केवल कर्तव्य समझकर किया है।"

जनसमूह ने जय जयकार करते हुए कहा- राजा महाराजाओं के आश्रितों ने उनके अभिनन्दन किये होंगे, धनवानों ने अपने वर्ग के लोगों के अभिनन्दन किये होगे, विदेशियों के जुए से देश को मुक्त करने के प्रयास करने वालों को शिक्षितों द्वारा अभिनन्दन किया होगा, लेकिन दीन-दरिद्रों, शोषित मजदूरों, केवल पेट की आग बुझाने के लिये जीने वालों तथा अज्ञान की दलदल में फंसे हुऐ स्त्री-पुरूषों द्वारा अभिनन्दन पाने वाले महापुरूषों और नेता महात्मा ज्योतिबा फुले ही है।

ज्योतिबा के बाद महात्मा की उपाधि पाने वाले दूसरे जननेता महात्मा गांधी है।

महात्मा ज्योतिबा फुले द्वारा लिखी गई पुस्तकें

  • 1885 - तृतीय रत्न
  • 1869 - पँवाड़ा छत्रपति राजा शिवाजी भोसला का
  • 1869 - ब्राह्मणों की चालाकी
  • 1873 - गुलाम गिरी
  • 1883 - किसान का कोड़ा
  • 1885 - सत्सार (अंक 1 और 2)
  • 1885 - चेतावनी
  • 1885 - अछूतों की कैफियत
  • 1889 - सार्वजनिक सत्य धर्म पुस्तक
  • अखंडादि काव्य रचनाऐं तथा लेख पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित

महात्मा ज्योतिबा फुले की अंतिम बात और इहलीला पूरी

1888 में ज्योतिबा को लकवा की बीमारी ने घेर लिया था और वे बिस्तर पर आराम करते हुए लिखते रहते थे। 27 नवम्बर 1890 की रात्री में उन्होंने अपने निकट के लोगों को बुला लिया और कहा कि "अब इलाज का कोई उपयोग नहीं है, अब मैं जो कुछ कह रहा हूँ उसे ध्यान से सुनियें:- मित्रों ! अब मेरे जाने का समय आ गया है, मैंने अपने जीवन में जिन-जिन कार्यों को हाथ में लिया उन्हें लगभग पूरा किया है, आप सभी ने मेरे कार्यों में मेरी जो मदद की उसका मूल्य आँकना संभव नहीं है, मेरी पत्नि सावित्री ने हर दम परछाई की तरह मेरा साथ दिया, मेरा पुत्र यशवंत अभी छोटा है, लेकिन उसमें कुछ करने की उमंग है, मैं इन दोनों को आपके हवाले करता हूँ। मेरे जाने से स्वाभाविक रूप से आपको दु:ख होगा, लेकिन जो जन्मता है, उसका मरना भी तो स्वाभाविक है। पहले हमारे पूर्वज गये आज मैं जा रहा हूँ, कल आप भी जाएंगे जब यह निश्चित है तब व्यर्थ शोक क्यों किया जाए?

आप अपना कर्तव्य करते रहें और सत्यशोधक समाज के विचारों को अपनाएँ, आपको मेरे साथ बहुत तकलीफें सहनी पड़ी और आगे इनमें भी ज्यादा तकलीफें सहनी पड़ सकती है लेकिन उनसे न डरते हुए ईश्वर के प्रति आदर रखते हुए आप अपना कार्य करते रहे।" रात के दो बज गये, ज्योतिबा ने सभी से प्रार्थना करने का अनुरोध किया, प्रार्थना शुरू हुई और थोड़ी देर में ज्योतिबा की इहलीला पूरी हो गई। 28 नवम्बर, 1890 को दोपहर बारह बजे यशवंत ने अंतिम संस्कार किया और एक महात्मा साहसी, कर्मठ, प्रेरक, बहुआयामी व्यकितत्व सामाजिक क्रांति के अग्रदूत सदा-सदा के लिए ओझल हो गये।

महात्मा ज्योतिबा फुले का वसीयतनामा

ज्योतिबा फुले ने 10 जुलाई, 1887 को अपना वसीयत नामा लिखा जिसका 18 जुलाई, 1887 को इसका पंजीकरण हुआ। यह वसीयत नामा आज भी महात्मा फुले के सरकार द्वारा संरक्षित उनके निवास पुणे में दर्शनीय है।

"मेरे बड़े भाई थे राजाराम गोविंद फुले, वे अब जीवित नहीं है। जिस दिन मैं और वे अलग हुए, उस दिन से हम दोनों ने अपना अपना जीवन व्यवसाय कर जो चल तथा अचल संपति अर्जित की और हर एक अपनी-अपनी संपति का मालिक है।"

"मेरी पत्नी के कोई संतान न होने से गंज पेठ में, केसोपंत सिंदी के मकान में रहने वाली काशी नामक स्त्री के पुत्र होते ही, मेरी पत्नी ने स्वयं उसकी नाल काटी और उसका अपने बेटे की तरह ही लालन-पालन किया, हमने उसे गोद लिया और उसका नामकरण किया - यशवंत उसकी आयु अब लगभग तेरह वर्ष है।"

"हम दोनों के बाद हमारा पुत्र यशवंत हमारी चल अचल संपति ओर अन्य संपति का स्वामी होगा, वयस्क बन जाने पर वह वंश परम्परा से उक्त सम्पति का स्वामी बने और उसका लाभ लें हमारी संपति पर हमारे रिश्तेदारों और भतीजा गणपत राजाराम फुले आदि का कोई उत्तराधिकार या स्वामित्व नहीं है हमारा पुत्र यशवंत अभी अवयस्क है, इसलिए मैं और मेरी पत्नी सावित्री उसका पालन-पोषण कर उसे पढ़ा रहे है इसके मूल में यहीं उद्देश्य है कि यशवंत अज्ञानी तथा पीड़ित, दीन हीन शुद्रातिशुद्र भाईयों को उनके मानव-अधिकारों का ज्ञान कराए और धूर्त, ठग, मानवद्रोही, पंडे-पुरोहितों के चंगुल से उन्हें मुक्त करने में अपना जीवन, अपना सर्वस्व लगाए तथा अपना जीवन सार्थक बनाए। हम दोनों की मृत्यु के बाद, सत्यशोधक समाज के नियमों के अनुसार हम दोनों का अंतिम संस्कार करने का अधिकार केवल यशवंत को है हम दोनों के कुल की प्रथा के अनुसार यथा संभव नमक के साथ दफनाये जाएँ।"

"यदि मेरी मृत्यु के बाद यशवंत नियमित रूप से स्कूल जाकर, अध्ययन करके मैट्रिक की परीक्षा उत्तीर्ण करके अन्य उपाधियाँ प्राप्त करने का प्रयास न करें, आवारा बन जाए या पराये व्यक्ति के पुत्र जैसा बर्ताव करने लगे, तो मेरी पत्नी सत्यशोधक समाज के सदस्यों के बहुमत से यशवंत को मेरे हिस्से वाले पुणे के मकान, खेत, बगीचे और कुएँ का हिस्सा देकर उसे अन्य संपति से बेदखल कर दे और सत्यशोधक समाज के सदस्यों के बहुमत से यशवंत के बदले माली, कुनबी, गड़रिया आदि शुद्र समाज में बालक सबसे समझदार और लायक होगा, उसे मेरी संपति का स्वामी बनाए और उसके हाथों सभी कार्य कराए, संक्षेप में शुद्रातिशुद्र को अपना दासानुसादास मनाने वाले ब्राह्मणों और उनके अनुयायियों की, मेरे शव और तत्संबधी विधियों पर छाया भी पड़ने न दी जाए।"

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